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कही तू खुदा तो नहीं…


मेरी हर गलती की सजा है तेरे पास…कही तू खुदा तो नहीं,

पूछता है वजह बेरुखी की…कही तू खुद ही इसकी वजह तो नहीं,

जानता है सबकुछ…और पूछता है सवाल कई,

ऐ दिल ! कही तू खुद ही अपनी धडकनों से अनजान तो नहीं !!!

राहे अनजान थी…


राहे अनजान थी…पर हौसले बुलंद थे…
हमसफ़र कोई नहीं..पर साथी कई थे…
हर पल जिन्दगी कोई…ख्वाब नया दिखाती थी…
कुछ कर गुजरने की…ख्वाहिश दिल में जगाती थी…
हर राह काँटों भरी…पैरो में पड़ते छाले थे…
इन मुश्किलों ने भी…कई अरमान रौंद डाले थे…
फिर भी बढ़ते रहे कदम…दिल ने हर न मानी…
कभी किसी की बात सुनी…कभी की मनमानी…
यू ही कभी कोई शिकायत…ज़िन्दगी से की…
तो कभी पलटकर…शिकायत ज़िन्दगी ने की…
चलते-चलते राह में भी…कई ठोकरे खाई…
गैरो से प्यार मिला…अपनों से रुसवाई…
बहुत कुछ खोकर…कुछ पाने का भरम है…
मिले तो खुदा की मैहर…न मिले तो अपना करम है…
पैरो तले तो आज भी वही अनजानी राहे है…
टूटे हुए सपने..फिर भी हौसलों से बुलंद निगाहे है…