Monthly Archives: March, 2012

यहाँ अपना घर बसाए तो बसाए कैसे…


अब कोई ख्वाबो में आये तो आये कैसे…
जब ख्वाब ही नींद से रूठ गए हो ऐसे…
नींद तो आ जाती है गोलिया खाकर भी…
पर नींदों में ख्वाबो को लाये तो लाये कैसे…

रूठ गया था वो बरसो पहले यु ही…
उस को आज मनाये तो मनाये कैसे…
न जाने क्यों उलझ गयी है जिन्दगी यु ही…
कोई बिगड़ी हुई बाते बनाये तो बनाये कैसे…

चले थे जब घर से तो काफिले साथ थे…
साथ हर राह अब चला जाये कैसे…
पीछे छूट गयी न जाने महफिले कितनी…
बिछड़े साथियों को बुलाये तो बुलाये कैसे…

गली-गली, शहर-शहर घूम आये है…
अब दिल बहलाए तो बहलाए कैसे…
जो मिली वो बस्ती यहाँ उजड़ी ही मिली..
यहाँ अपना घर बसाए तो बसाए कैसे…

कैसे बताऊ क्या हो तुम…


कैसे बताऊ क्या हो तुम…
मेरे लिए एक एहसास हो तुम…
हर किसी से हो तुम जुदा…
मेरा एक रिश्ता खास हो तुम..
इस जीवन को संगीत दे…
ऐसा एक साज़ हो तुम…
मेरे दिल की परिभाषा…
मेरे शब्दों की आवाज़ हो तुम…
कभी शर्माती, कभी इठलाती…
एक अबूझ पहेली हो तुम…
कभी रूठती कभी मनाती…
मेरी प्यारी सहेली हो तुम…
किसी बाग की खुशबु हो…
या फूल की कली हो तुम…
खुशियों की सौगात बनकर…
मुझे तोहफे में मिली हो तुम…

जैसे कोई आशियाँ जल उठा हो…


इन ठंडी बर्फीली हवाओ के बीच…
यह गर्म हवा का झोका…
जैसे कोई आशियाँ जल उठा हो…

इन गैरो के बीच…
कोई अपना होने का धोका…
अँधेरे में कोई दिया जल उठा हो…

इस अँधेरी रात में खड़ी…
कोई छोटी से चांदनी…
जैसे काँटों में कोई फूल खिल उठा हो…

तुम्हारा पास आकर भी…
यु मुह मोड़ लेना…
जैसे कोई जिया जल उठा हो…

तुम्हारी मेरी दूरी के बीच…
एक अनजानी सी आशा…
जैसे दीवार में कोई झरोखा हो…

किसी नदी के किनारे…
उसमे कंकर फेकता…
मेरा अक्स बैठ हो…

मेरे सपनो और अरमानो को…
देने एक हसीं जिन्दगी…
आया एक मौका हो…

कभी तो पूरी हो कोई आरजू..
या पूरा हो कोई ख्वाब…
ऐसा मैंने सोचा हो…

ख़ुशी की तलाश में…


यु तो क्या कहे की जिंदगी ने इम्तेहान बहुत लिए…
आँखों में आंसू कम, पर दिल पे जख्म कई दिए…
हर पर ख़ुशी की तलाश में भटकती रही जिन्दगी…
ख़ुशी न मिली, तो गम छुपाने के लिए मुस्कुरा दिए…

किसी अधूरे से ख्वाब ने…


किसी अधूरे से ख्वाब ने रातभर नींद में जगाया…

दुसरो की शक्ल में अक्सर खुद से ही धोखा खाया…

मुश्किलों भी अपना फ़र्ज़ निभाती रही बखूबी……

रास्तो ने चलना और ठोकरों ने सम्हलना सिखाया…

मकानों के शहर में एक घर ढूँढती हूँ…


मकानों के शहर में एक घर ढूँढती हूँ…
रात जो खो गयी थी वो सहर ढूँढती हूँ…
हर चेहरे में छुपा है कोई और ही शख्स…
मै आईने में अपना ही अक्स ढूँढती हूँ…
मकानों के शहर में एक घर ढूँढती हूँ…

बारिश का वो काला बादल…
माँ का आसू पोछता आँचल…
सखी-सहेलियों की वो बाते…
और बरसो पुरानी मुलाकाते…
जब बैठा करते थे सब साथ कही…
ऐसा कोई पहर ढूँढती हूँ…
मकानों के शहर में एक घर ढूँढती हूँ…

हर रोज़ नयी फरमाईशे…
चाँद को पाने की ख्वाहिशे..
सपनो से भरी वो आखे…
सोती-जागती सी राते…
मचलती थी जो दिल में अक्सर..
ऐसी ही कोई लहर ढूँढती हूँ…
मकानों के शहर में एक घर ढूँढती हूँ…

मन में छुपी कई उलझने…
और राहों की वो अडचने..
चेहरों पर चढ़े वो नकाब…
दिल बहलाने के अंदाज़…
बे-परदा हो गए अब सच सारे…
किसी दिल में छुपा ज़हर ढूँढती हूँ…
मकानों के शहर में एक घर ढूँढती हूँ…