जब भी कभी दिल जोरो से धड़कता है…
कोई जुबा पे ख़ामोशी रख जाता है…

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ना जाने क्या जज़्बा लेके कोई जान देता होगा देश के लिए ,
जहा लड़ पड़ते है लोग सडक चौराहो पे तेरा-मेरा कहते हुए !!!


मरती तो उम्मीदे है..ख्वाब कभी मरा नहीं करते !!!


घिसी तो नीम की छाल भी और चंदन की डाल भी,
नसीब था की कोई माथे चढ़ा तो कोई जख्मों में पड़ा!!!

बहुत मुश्किल है तेरा खुदा होना


बहुत मुश्किल है तेरा खुदा होना,
तेरा खुद होकर भी तू ना होना,
मिट्टी मे मिलना और फ़ना हो जाना,
फिर भी हर जर्रे मे अपना वजूद बताना,

बहुत मुश्किल है तेरा आशिक़ होना,
किसी और को चाहना और खुद से खफा रहना,
हर कीमत पे उसे पाने की ख्वाहिश रखना,
और खुद को मिटा देने का हौसला रखना,

बहुत मुश्किल है तेरा इंसान होना,
अपनो से धोखा खाना और गैरो के अपनाना,
दिल पे चोट खाना और आँखो से मुस्कुराना,
मौत से डरना और जिंदगी पे रहम खाना,
…और सबकुछ खोकर बस तेरा हो जाना

किससे बोले, किससे शिकायत करे…


किससे बोले, किससे शिकायत करे…
कही तो कोई खुदा हो, जिसकी इबादत करे…
पत्थर पे भी खिल जाते है फूल कभी…
कैसे जुगनुओ से रौशनी की दुआ करे…

बड़ी मासूम है दिल की फितरत…
सुबह को लड़े शाम को सुलह करे…
मुद्दतो से पढ़ रहे है किस्सा-ए-कानून…
जो दिल को पसंद हो ऐसा कोई गुनाह करे…

फितरत है ज़माने कि शिकायत करना…
अब किस किससे जा करके जिरह करे…
न ही कोई फ़ौज़ न हथियार है कोई…
फिर कैसे ये जंग फतह करे…

रो सकता दिल तो तड़प आँखों में होती…


रो सकता दिल तो तड़प आँखों में होती…
शाम की चमक गहरी रातो में होती…
दिन महरूम होता सूरज की रौशनी से…
किस्मत की एक लकीर जो अपने हाथो में होती…

ये कदम…


ये कदम न जाने मुझे कहा ले जायेंगे…
कभी तो सपनो पर पड़े परदे उठ जायेंगे…
एक दिन तो हकीकत से सामना होगा…
वो दिन न जाने कैसा जलजला होगा…
ख़ुशी का मौसम होगा या माहौल-ए-गम होगा…
खुशियो से खिलेगा जीवन या भीगा दामन होगा…
बंद मुट्ठियों में न जाने किसकी राख होगी…
मेरे सपने मरेंगे या ख़ुशी की सास होगी…
कुछ पाने क लिए कुछ खोना तो होगा…
जो पीछे छूट जायेगा वो भी मेरा अपना होगा…
अपनों को खो देने का गम मुझे तनहा कर देगा…
इन तन्हाइयो से भी दूर जाना ही होगा…
किसी के कदम से ताल मिलनी तो होगी…
फिर से एक नयी जिंदगी जीनी तो होगी…

तुम्हारी याद आती तो बहुत है…


तुम्हारी याद आती तो बहुत है…
दिल को मेरे तड़पाती बहुत है…
दिल को अपने बहला लेती हु मै…
हौले से जख्म अपने सहला लेती हु मै…
दूर रहकर भी जुदा नहीं है…
शिकायत है मगर खफा नहीं है…
कैसे करे अफ़सोस कि दुरिया है…
ये तो वक़्त की मजबूरिया है…
पाकर किसी को खो देती हु मै…
याद कर तुम्हे रो लेती हु मै…
सहेजकर रखा है इन यादो को अल्फाज़ो में…
छुपा रखा है इन अल्फाज़ो को कही किताबो में…

अच्छे तो हम बच्चे थे…


टूटे हुए दिल से, टूटे खिलोने अच्छे थे…
डाट से बचने को झूट बोलते पर दिल के बड़े सच्चे थे…
रातो मे नींद थी और दिन भी बड़े अच्छे थे…
बड़े होकर बड़े निराश हुए, अच्छे तो हम बच्चे थे…